हक की बात
जब भी मुक्ति की बात की
परिधानों पर सवाल उठाया।
जब भी आजादी की बात की
उछाल दिया परिवार और तलाक का जुमला।
अपनी मर्जी की जब बात की
उच्छृंखलता का इल्जाम लगा दिया।
अस्मिता की जब गुहार लगाई
उकसावे का आरोप लगाया।
जब-जब बेड़ियाँ तोड़नी चाही
आभूषणों का सवाल उठाया।
रिश्ते-नातों के दम पर
बदनियती का दाग छुपाया।
सम्मान चाहा हमने जब
सामान बना डाला।
सौंदर्य की आकांक्षा को
विज्ञापन में सजाकर
बाजार के हवाले कर डाला।परिधानों पर सवाल उठाया।
जब भी आजादी की बात की
उछाल दिया परिवार और तलाक का जुमला।
अपनी मर्जी की जब बात की
उच्छृंखलता का इल्जाम लगा दिया।
अस्मिता की जब गुहार लगाई
उकसावे का आरोप लगाया।
जब-जब बेड़ियाँ तोड़नी चाही
आभूषणों का सवाल उठाया।
रिश्ते-नातों के दम पर
बदनियती का दाग छुपाया।
सम्मान चाहा हमने जब
सामान बना डाला।
सौंदर्य की आकांक्षा को
विज्ञापन में सजाकर
हमने पुरुषों की बातें कीं
नारी को ही सम्मुख खड़ा कर डाला।
छोड़ क्यों नहीं देते यह जिम्मा
हमें क्या, कब, कितनी और कैसी चाहिए!
नारीत्व हम से है
इसको परिभाषित करने का हक
हमारा है, हमें चाहिए … बस।