संस्मरण - जगह मकानों में नहीं होते

जगह मकानों में नहीं होते

संस्मरण की जब भी बात चलती है, समूह के अधिकांश मित्रों की तरह ही, मेरी भी स्मृति में बचपन के अविस्मरणीय पल सजीव हो उठते हैं।

मेरे घर के पास ही हमारी पाठशाला थी। उसी पाठशाला में मुझसे दो दर्जा नीचे दो भाई साथ ही पढ़ते थे। उनका घर तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर था। उनसे मेरी निकटता की वजह यह भी थी कि उनकी दादी मेरी एक चाची की बुआ थी। इस नाते किसी भी खास तरह के आयोजनों में एक दूसरे के घरों में हम सभी का आना जाना लगा रहता था। दोनों भाइयों में बड़ा वाला मुझसे थोड़ा बड़ा और छोटा वाला मुझसे थोड़ा छोटा था। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि हम तीन भाई ही हों।

गर्मी के दिनों में शाम को जब दोनों भाई घरों को लौटते तो कई बार मैं भी उनके साथ ही हो लेता। दोपहर के लंच का उस समय रिवाज नहीं था। वे सुबह ही भोजन कर के आते थे और फिर शाम को लौटकर सुबह का ही बचा-खुचा खाकर तृप्त हो जाते थे। उनके घर की माली हालत भी ठीक नहीं थी। हालाँकि यह कोई वजह नहीं थी उनके लंच नहीं लाने की। उस वक्त का संभवतः यही रिवाज था।

उनकी आर्थिक स्थिति चाहे जो भी रही हो, मुझे उस पूरे परिवार में जो संभ्रांत संस्कार दिखे, वह बड़े-बड़े रईसों और धनाढ्यों में भी नहीं मिलता। ऐसा कोई कोई दिन नहीं रहा जब मैं बिना भोजन किये उस गरीब के घर से निकला होऊँ। उसके घर खाये कुरथी (कुल्थी) की दाल और भात का स्वाद आज भी ढूँढता रहता हूँ। इस संस्मरण को लिपिबद्ध करने का मेरा प्रयत्न भी उस नायाब स्वाद की तलाश ही है। इस दाल को सूखे आम की खटाई के साथ बनाया जाता था। मिर्च और आम के सम्मिश्रण का ताज़िंदगी आद आने वाला एक अनोखा स्वाद! कुल्थी भी क्या चीज है, करीब-करीब पत्थर की तरह ही सख्त एक दलहन जो पथरीली जमीन पर उगाया जा सकता है। आजकल पथरी के इलाज या कोलेस्ट्रॉल घटाने के उपाय के रूप में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कहते हैं दशरथ माँझी ने इसी दाल के पानी का इस्तेमाल पहाड़ तोड़ने के लिए भी किया था।

एक बात और भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि उस स्वाद को मैंने कभी खाते समय शायद नहीं महसूस किया होगा! पहली बार उस स्वाद का एहसास वर्षों बाद तब हुआ था, जब एक शहर में रहने वाले रिश्तेदार ने एक शाम का आश्रय तो दिया था पर भोजन के लिये निकट के रेस्टोरेंट का पता बता दिया था। सच ही कहा गया है, जगह घर में नहीं होता, दिल में होता है!

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