लघुकथा - उल्टा हिसाब

लघुकथा - उल्टा हिसाब

शहर में श्रीयुत श्री श्री १०८ परमानंद अच्युतवर्धन निःशेष महाराज के पुण्य प्रवचन का आयोजन होने वाला था। शहर भर में इस आयोजन की धूम मची हुई थी। मोहल्ले की पड़ोसनों से सुनकर लीलावती को भी लगा कि एक दिन स्वामीजी के प्रवचन सुनने के लिए पति के साथ जाना ही चाहिए। मामला धर्म-कर्म से बढ़ कर सामाजिक असर-रसूख का बन गया था शायद! पत्नी की जिद के आगे शंकर और विष्णु की न चली तो आलोकनाथजी की क्या बिसात भला !

संपर्क सूत्र तलाशे, बड़े चढ़ावे की बात स्वीकारी तब कहीं जाकर बुकिंग हो पाई। अगली पंक्ति में सोफे पर पत्नी सहित जब विराजमान हुए तो कुछ ऐसा ही एहसास हो रहा था जैसे जीवन सफल हो गया हो। खासकर जब पत्नी की आँखों में गर्व का भाव देखा तो लेन-देन का सारा दुःख जाता रहा।

स्वामीजी के दर्शन पाते ही सभास्थल तालियों से गूँज उठी। लोग जयकारे लगाने लगे। स्वामीजी का प्रवचन शुरू हुआ। अपनी सशक्त वाणी से स्वामीजी ने इस दुनिया को माया और सम्पत्ति को कंकर-पत्थर साबित कर दिया।

घर लौटते हुए लीलावतीजी सन्यास की मुद्रा में ऊब-डूब हो रही थीं और आलोकनाथजी उल्टे सौदे की गहन पड़ताल कर रहे थे !

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