बैकपैक से प्यार - हिंदी हास्य कविता (Backpack - Hindi Humorous Poetry)

बैकपैक

देख लिये जब बीवी के नखरे
जग में सहकर कष्ट हजार,
हो गया है अब तो मुझको
अपने बैकपैक से प्यार।

पीठ पर डालो अथवा रखना
बनाकर अपने गले का हार,
उफ न करती साथ निभाती
सहती रहती जुल्म अपार।

अरी बीवियों तुम क्या जानो
कैसे चलता है घरबार,
ले लो सीख चाहे थोड़ा ही
देखकर बैकपैक को यार।

त्याग समर्पण की पराकष्ठा
कितना अद्भुत यह संसार,
उफ न कर सकता है कोई
चाहे कितना हो अत्याचार।

उठापटक से बेखबर वह
कभी न देती है दुत्कार,
बीवी के ताने और उलाहने
अक्सर करते शर्मसार।

'मूड नहीं' का इलाज कहाँ है
हकीम लुकमान चुके हैं हार,
साथ निभाती बिना शर्त है
बैकपैक अपनी हाट-बजार।

मामा, ताऊ, फूफा सबके सब
डर से फटक न पाते द्वार,
डाल बैकपैक पीठ पर भैया
हम तो चला रहे कारोबार।

पत्नी के संग जब निकलो
ढोना सूटकेस का अति भार,
बैकपैक में डाल के चंद
मर्जी से लूटो मौज-ए-बहार।

कृष्ण कन्हैया जो मैं, वह भी राधा रानी
खेल रही बरसाने की है वह तो लट्ठमार,
कृष्ण सुदामा के सदृश दु:ख-सुख में
गले लगाती बैकपैक ही तो हरबार।

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