लघुकथा - लोकतंत्र के नाम पर

❄ लघुकथा - लोकतंत्र के नाम पर ❄

सुबह-सुबह ही भागता हुआ उस तथाकथित नामी गिरामी स्कूल में गुड़िया के दाखिले का पता करने गया था, जहाँ चार दिन पहले ही चार साल की गुड़िया, पत्नी तथा स्वयं का साक्षात्कार हुआ था। विद्यालय के सूचिपटल पर नाम तो था पर जन्म-प्रमाणपत्र सहित अन्य दस्तावेज व पैसे जमा करने के लिए दो ही दिन का समय दिया गया था, जिसके बढ़ने की कोई सम्भावना नहीं थी।

स्कूल से सीधा भागता हुआ नगरनिगम के दफ्तर में पहुँचा। देर तक प्रतीक्षा करने के बाद बाबू से मुलाकात हुई तो हलफनामे सहित कई अन्य औपचारिकताओं की फेहरिस्त थमा दी गई। उसकी असली चिंता तो समय को लेकर थी।  ख़ैर, कुछ सौ में द्रुत सेवा की बात बन गई। ......... शाम को बुलाया था।

जल्दबाजी में यू-टर्न पर लालबत्ती का ध्यान नहीं रख पाया। बहुत से अन्य लोगों की तरह वह भी मुड़ गया। परन्तु उसकी बदकिस्मती ........ ट्रैफिक सिपाही उसे रुकने का इशारा कर रहा था। उसके पास न तो समय था, न संसाधन ! जोखिम मोल ले ली। मोटरसाइकिल को तेजी से दाहिनी ओर से भगाने के चक्कर में सड़क पर उभर आये गड्ढे के कारण संतुलन खोकर विभाजक की रेलिंग से टकरा गया। हेलमेट तो गड्ढे के हिचकोले से ही उड़कर उस पार जा गिरा। ........ जख्म कनपटी पर लगा था  ....... ढेरों तमाशबीन ......... ! जितने मुँह, उतनी बातें !

देश गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियों में डूबा हुआ है ! संविधान के किस पृष्ठ पर लिखा हुआ है कि  सारी  गलती लोगों की ही होगी, पालकों की गलतियों का कोई हिसाब ही नहीं .........  !

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...