लघुकथा - प्रसव पीड़ा

विषय - प्रसव पीड़ा

रात से ही झिंगुरिया का दर्द बढ़ता जा रहा था। पल-पल उसकी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। मगर घरवालों की निर्लिप्तता उसकी बेचैनी को और भी बढ़ा रही थी।उसका मरद हमेशा की तरह खेत में काम करने के लिये जाने की तैयारी में जुटा हुआ था। सास-ससुर ने सुना तो एक दूसरे की ओर कनखियों से मुस्कुराते हुए देखा।

"लगता है इस बार लड़का ही होगा। इतनी जल्दबाज़ी पुरुषों को ही होती है। स्त्री जाति तो गर्भ से ही धीरज और अनुशासन सीखकर आती है। डॉक्टरनी के हिसाब से तो अभी कम से कम बीस से पच्चीस दिन देर है।" इसके साथ दोनों ही अनुभवी बुजुर्गों ने न जाने कितने ही किस्से दुहरा डाले, जब समय पूर्व प्रसव में लड़का होना पाया गया था।

इतिहास और सपने की दुनिया से बाहर निकल जबतक झिंगुरिया का ख्याल आता … !

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...