एक समसामयिक हास्य-व्यंग्य
होठों पर है मँहगी लाली
मुख से निकले सस्ती गाली।
किसी बात पर शर्म नहीं आती है
बेशर्म अदा बहुत अब भाती है।
पहन लिया पजामा ढीला
बनाकर प्लाजो रंगीला।
बुढ़िया जब ब्यूटीपार्लर से आती है
बुड्ढों की छाती छलनी कर जाती है।
देखो कितनी मस्त है
मोबाइल पर व्यस्त है।
बेटा-बेटी बहुत सुस्त हैं
माँ-बाप इसलिए चुस्त हैं।
तीर समुंदर नैवेद्य ले रहे
बाला संग धूप सेंक रहे।
कथनी-करनी होती सम नहीं
जब जैसी, तब तैसी, हर कहीं।
लगता है जैसे अँधेर है
कहते हैं पीढ़ी का फेर है।
देखो कितने दिन चलती है
एक दिन तो सबकी ढलती है।
होठों पर है मँहगी लाली
मुख से निकले सस्ती गाली।
किसी बात पर शर्म नहीं आती है
बेशर्म अदा बहुत अब भाती है।
पहन लिया पजामा ढीला
बनाकर प्लाजो रंगीला।
बुढ़िया जब ब्यूटीपार्लर से आती है
बुड्ढों की छाती छलनी कर जाती है।
देखो कितनी मस्त है
मोबाइल पर व्यस्त है।
बेटा-बेटी बहुत सुस्त हैं
माँ-बाप इसलिए चुस्त हैं।
तीर समुंदर नैवेद्य ले रहे
बाला संग धूप सेंक रहे।
कथनी-करनी होती सम नहीं
जब जैसी, तब तैसी, हर कहीं।
लगता है जैसे अँधेर है
कहते हैं पीढ़ी का फेर है।
देखो कितने दिन चलती है
एक दिन तो सबकी ढलती है।