⭐ संस्मरण ⭐
लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन वैशाली की ओर जाती हुई मेट्रो प्लेटफार्म पर लगती है बहुत से अन्य यात्रियों के साथ एक प्रौढ़ व्यक्ति का भी पदार्पण होता है। काले सूट में सज्जित व्यक्ति वकील भी हो सकता था और नहीं भी।
हाँ, इसलिए कि उन्होंने आते ही बुजुर्गों के लिये आरक्षित सीट पर कब्जा जमाये गैर अधिकृत युवा युगल में से युवक को उठने का इशारा कर दिया। अब चूँकि वह युवती के साथ बैठा था तो सोने का भी नाटक नहीं कर सकता था! इस तरह खिलखिलाते जोड़े को अलग करने की हिम्मत मैं नहीं कर सकता था, अतः यमुना बैंक स्टेशन से ही टुकुर-टुकुर देखता हुआ, कहानियाँ गढ़ रहा था।
नहीं, इसलिये संभव है कि सीट मिलते ही अपने चेहरे पर एक दैन्य का भाव ओढ़ लिया, जैसे कि युगल को अलग कर देने का अपराधबोध तिर आया हो! अपराधबोध से ग्रसित होना किसी वकील को भला शोभा देता है! युवक से आज हुई मूसलाधार बारिश से आई आफत के बारे में बातें करने लगा, इस बात से बिल्कुल बेपरवाह कि युवक की कितनी दिलचस्पी हो सकती थी उसकी दैन्य कथा में।
"देख रहे हैं मेरे कपड़े कैसे हो गये बारिश के कारण।" वैसे कपड़े तो उनके अच्छे भले थे, पता नहीं क्या दिखाना था!
- "हमारे मुहल्ले में तो आज नरक हो रखा है। लोग घरों की खिड़कियों से लटक कर निकल रहे थे। सड़क पर टखनों तक पानी था। कोई साधन नहीं, कोई रिक्शा नहीं, कुछ भी नहीं।"
- हाँ आज मौसम थोड़ा खराब तो है।" लड़के ने शिष्टाचारवश कहा।
कुछ ही दिनों पहले किसी का कहा याद आ गया। 'भाई साहब अब जाड़े में कहाँ बारिश होती है जी! पहले, (हमारे जमाने में) भाई साहब, (होंठ गोल कर बोलने का दिल्ली का पारंपरिक अंदाज) एक दो बार तो जरूर से वो बारिश होती थी, वो बारिश होती थी कि भाई साहब, बस पूछो ही मत…।'
दो स्टेशन बाद मैं उतरकर मैं चल पड़ता हूँ, अपने दफ्तर की ओर। सोचता जा रहा था, 'शायद पर्यावरण कुछ सुधरे एक दो दिनों के लिए'।
लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन वैशाली की ओर जाती हुई मेट्रो प्लेटफार्म पर लगती है बहुत से अन्य यात्रियों के साथ एक प्रौढ़ व्यक्ति का भी पदार्पण होता है। काले सूट में सज्जित व्यक्ति वकील भी हो सकता था और नहीं भी।
हाँ, इसलिए कि उन्होंने आते ही बुजुर्गों के लिये आरक्षित सीट पर कब्जा जमाये गैर अधिकृत युवा युगल में से युवक को उठने का इशारा कर दिया। अब चूँकि वह युवती के साथ बैठा था तो सोने का भी नाटक नहीं कर सकता था! इस तरह खिलखिलाते जोड़े को अलग करने की हिम्मत मैं नहीं कर सकता था, अतः यमुना बैंक स्टेशन से ही टुकुर-टुकुर देखता हुआ, कहानियाँ गढ़ रहा था।
नहीं, इसलिये संभव है कि सीट मिलते ही अपने चेहरे पर एक दैन्य का भाव ओढ़ लिया, जैसे कि युगल को अलग कर देने का अपराधबोध तिर आया हो! अपराधबोध से ग्रसित होना किसी वकील को भला शोभा देता है! युवक से आज हुई मूसलाधार बारिश से आई आफत के बारे में बातें करने लगा, इस बात से बिल्कुल बेपरवाह कि युवक की कितनी दिलचस्पी हो सकती थी उसकी दैन्य कथा में।
"देख रहे हैं मेरे कपड़े कैसे हो गये बारिश के कारण।" वैसे कपड़े तो उनके अच्छे भले थे, पता नहीं क्या दिखाना था!
- "हमारे मुहल्ले में तो आज नरक हो रखा है। लोग घरों की खिड़कियों से लटक कर निकल रहे थे। सड़क पर टखनों तक पानी था। कोई साधन नहीं, कोई रिक्शा नहीं, कुछ भी नहीं।"
- हाँ आज मौसम थोड़ा खराब तो है।" लड़के ने शिष्टाचारवश कहा।
कुछ ही दिनों पहले किसी का कहा याद आ गया। 'भाई साहब अब जाड़े में कहाँ बारिश होती है जी! पहले, (हमारे जमाने में) भाई साहब, (होंठ गोल कर बोलने का दिल्ली का पारंपरिक अंदाज) एक दो बार तो जरूर से वो बारिश होती थी, वो बारिश होती थी कि भाई साहब, बस पूछो ही मत…।'
दो स्टेशन बाद मैं उतरकर मैं चल पड़ता हूँ, अपने दफ्तर की ओर। सोचता जा रहा था, 'शायद पर्यावरण कुछ सुधरे एक दो दिनों के लिए'।