आम दिनों की तरह आज भी पुलिस कॉलोनी के पास वाले चौराहे पर सिग्नल की प्रतीक्षा में गाड़ियों की कतार लगी हुई थी। तभी एक वृद्ध सज्जन, जिसकी अवस्था यही कोई पैंसठ के करीब रही होगी और संभवतः पक्षाघात के असर के कारण पैरों को घसीट कर चल रहा था, सड़क पार करते हुए गाड़ी के बलार्ड में हाथ में झूल रहा थैला फँस जाने के कारण संतुलन खोकर गिर पड़ा। थैले की सब्जी और फल बिखरे सो अलग। वाहन चालक जो कि पुलिस की वर्दी में था, ने खा जाने वाली नजरों से वृद्ध को देखा, मगर इससे पहले कि वह कोई मोटी सी गाली निकालता साथ में बैठे हुए उसके अधिकारी ने मना कर दिया और त्वरित गति से गाड़ी से उतरकर वृद्ध को सहारा देने लगा। इसी क्रम में वृद्ध का हाथ उस मदद करने वाले वयक्ति के गर्दन पर चला गया।
..... यह क्या, अनायास ही व्यक्ति के गर्दन के मस्से पर वृद्ध की अनामिका उंगली इस प्रकार एक ख़ास अंदाज में गोल-गोल घूम रही थीं मानों उसे कभी ऐसा करने का अभ्यास और अधिकार रहा हो !
वृद्ध के मुँह से स्वतःस्फुट बुदबुदाहट निकली “कालू …. कालिया ..... बिलकुल ऐसा ही एक मस्सा उसके भी गर्दन पर था”. ..... पर शीघ्र ही सजग हो गया और बोला “माफ़ करना बेटे, तुम्हें तकलीफ हुई, गलती मेरी थी”.
अधिकारी को भी हाथों का वह खास स्पर्श पहचाना सा लगा। ..... “कहीं आप प्रधान सर तो नहीं! ....... याद है, जब पटना में अपनी पोस्टिंग के दौरान आपने प्लेटफार्म पर अनाथ बच्चों की कक्षाएँ लगानी शुरू की थीं, फिर उसमें से चुनकर कुछ लोगों को हैदराबाद के एक एन.जी.ओ. को सुपुर्द किया था! … मैं ..... वही ..... प्लेटफार्म का आवारा..... कालिया ....... “!
जिसने भी इस छोटे से संवाद को सुना ...... आश्चर्यचकित हो गया ...... एक अनाथ का नाथ आज इस रूप में मिला।