ग़ज़ल … एक बात ऐसी हो गई

तसल्ली की बात बस इतनी कि शुरुआत हो गई
न चाहता था कभी जो हो, बस वही बात हो गई।

यूँ ही तन्हा सफर ज़िन्दगी का मेरा कटता रहा
जब न थी कोई उम्मीद उनसे मुलाकात हो गई।

या खुदा ज़िन्दगीभर मुसलसन रोते ही रह गये
मुस्कुराहटें नुमाया फेहरिस्ते इल्जामात हो गई।

चल रही थी ज़िंदगी बेसाख्ता एक सी लकीर पर
आखिरी पलों में जाने किसकी खुराफात हो गई।

कोसा किये जिसको हमेशा दिल की गहराइयों से
जब छोड़ दिया सभी ने, एक वही साथ हो गई ।

निकल पड़े थे इस मयकदे से तेरे मायूस होकर
शुक्र की बात है, देर से ही सही, बरसात हो गई ।

ताउम्र समझ न सके जिसको प्यार के काबिल
ठुकरा दिया दुनियाँ ने 'सुन', वही खैरात हो गई।

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