हे देवाधिदेव, हे महादेव
एक बार फिर से आना तुम
हो रही उलटी जग की रीत
इसको सीधी कर जाना तुम।
अनाचार की बयार है
आगे बहने ना देना तुम
लेकर हाथों में त्रिशूल
तांडव फिर से मचाना तुम।
हो रहा है जग उद्वेलित
शीतल चांद सजाना तुम
होता नहीं उद्धार दिखता
गंगा अविरल कर जाना तुम।
हो रही है मानवता पीड़ित
वरदान अभय दे जाना तुम
सूना है मन का आंगन
गौरी संग बस जाना तुम।
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