बेटी गाँव की इज्जत
गोपी की बेटी की शादी थी। शादी रात में ही हो गई लेकिन बारात टिकी हुई थी। मर्यादी का रिवाज था। दोपहर में कच्चा-पक्का खाना खिलाने का दस्तूर था। सुबह के समय से ही समधी का गुस्सा ज्येष्ठ मास के सूरज की तरह चढ़ता ही जा रहा था। रात के सम्मान में ही त्रुटियाँ रह गई थीं।
छोटे के दुकान की देहरी (यहीं पर आजकल चौपाल जमती है) पर बैठे टोले के कई तरह के लोग एक दूसरे से इशारे-इशारे में ही जानने का प्रयास कर रहे थे कि माजरा क्या है ?
दर-असल गोपी की माली हालत अच्छी नहीं थी और कमोबेश यही हालत उसकी जुबान की भी थी ! चूंकि सारी बिरादरी को खिलाने की उसकी औकात नहीं थी इसलिए सिर्फ औरतें ही हंकार पर गीत गाने भर जाती थीं। किसी ने बताया ‘गोपी बाबू का सारा इंतजाम फेल हो गया है। पत्तल तक कम पड़ गया है। कहीं से उधार लेकर भी काम चलाने की स्थिति नहीं रही। बारातियों की संख्या उम्मीद से बहुत अधिक हो गई थी। ..... उसे यह भी शक है कि किसी गाँव वाले ने ही उसे बेइज्जत कराने के लिए लड़के वाले को चुनौती देकर बारातियों की संख्या बढ़वा दी थी।’ ..... इशारा दादा की तरफ था, सरपंच के चुनाव में दादा उम्मीदवार थे और गोपी ने दूसरे टोले के हरसुमेर का साथ दिया था। दादा मात्र तीन मतों से सरपंची का चुनाव हर गए थे।
दादा तमतमाकर देहरी छोड़ उठ खड़े हुए। बोले। …. “बेटी गाँव की इज्जत होती है। सब अपने-अपने घर जाओ और जिससे जो बन पड़े लेकर आओ। “
फिर तो बारातियों को वो स्वागत हुआ कि लोग आजतक कर्णगढ़ गाँव की मिसाल देते हैं।
गोपी की बेटी की शादी थी। शादी रात में ही हो गई लेकिन बारात टिकी हुई थी। मर्यादी का रिवाज था। दोपहर में कच्चा-पक्का खाना खिलाने का दस्तूर था। सुबह के समय से ही समधी का गुस्सा ज्येष्ठ मास के सूरज की तरह चढ़ता ही जा रहा था। रात के सम्मान में ही त्रुटियाँ रह गई थीं।
छोटे के दुकान की देहरी (यहीं पर आजकल चौपाल जमती है) पर बैठे टोले के कई तरह के लोग एक दूसरे से इशारे-इशारे में ही जानने का प्रयास कर रहे थे कि माजरा क्या है ?
दर-असल गोपी की माली हालत अच्छी नहीं थी और कमोबेश यही हालत उसकी जुबान की भी थी ! चूंकि सारी बिरादरी को खिलाने की उसकी औकात नहीं थी इसलिए सिर्फ औरतें ही हंकार पर गीत गाने भर जाती थीं। किसी ने बताया ‘गोपी बाबू का सारा इंतजाम फेल हो गया है। पत्तल तक कम पड़ गया है। कहीं से उधार लेकर भी काम चलाने की स्थिति नहीं रही। बारातियों की संख्या उम्मीद से बहुत अधिक हो गई थी। ..... उसे यह भी शक है कि किसी गाँव वाले ने ही उसे बेइज्जत कराने के लिए लड़के वाले को चुनौती देकर बारातियों की संख्या बढ़वा दी थी।’ ..... इशारा दादा की तरफ था, सरपंच के चुनाव में दादा उम्मीदवार थे और गोपी ने दूसरे टोले के हरसुमेर का साथ दिया था। दादा मात्र तीन मतों से सरपंची का चुनाव हर गए थे।
दादा तमतमाकर देहरी छोड़ उठ खड़े हुए। बोले। …. “बेटी गाँव की इज्जत होती है। सब अपने-अपने घर जाओ और जिससे जो बन पड़े लेकर आओ। “
फिर तो बारातियों को वो स्वागत हुआ कि लोग आजतक कर्णगढ़ गाँव की मिसाल देते हैं।