भाव खा गया चाँद

भाव खा गया चाँद

निकले थे ढूंढने
सबसे खूबसूरत चाँद को
मगर भाव खा गया चाँद आज तो
बाहर निकल कर देखा, छत पर भागा
फुंफकार रही थी सामने की ऊँची मकान
और कोने से दीख रहा था
चमकता हुआ लैंप पोस्ट
समय जाया किए बिना
भागकर पहुंचे नजदीकी पार्क
और ढूंढ निकाला
ओह.....! कितना मरियल सा लगा यह चाँद
कभी विलीन हो रहा था
तो कभी अपनी वजूद का
अहसास करता सा प्रतीत हो रहा था
एक रोगग्रस्त बूढ़े की तरह
जो खाँसते-खाँसते बेदम होकर
पस्त पड़ जाता है
और थोड़ी देर बाद ही
साँसों पर पाते ही काबू
सुनाने लग जाता है
गुजरे दिनों के किस्से
प्यार भरे, जवानी के
अलबेले अफसाने
फिर नीली आँखों की गहराई में
तैरने लगती है चमक उम्मीद की
और सुगबुगाने लगता है जीवन
होने लगता है ग्रहण का अवसान
01/02/2018

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