यात्रा संस्मरण - एक अनुभव जरा हटके

वाकया मेरी  ताजातरीन यात्रा का है।  अनुभव भी कुछ हटकर है, कुछ आत्म साक्षात्कार जैसा है,
कुछ बनी बनाई धारणाओं के टूटने का भी है।

अंदाजा लगाइये कि आप ट्रेन की आरक्षित सीट पर पहुचें और पता चले कि आपकी बर्थ चार ऐसे
इंसान जो कद काठी में तो पुरुषों की तरह हों मगर नारी वेश में हों, आपकी निर्धारित सीट पर
काबिज हैं, तो आप पर क्या गुजरेगी! जी हाँ, मुस्कुरा रहे होंगे आप! लेकिन इसमें मुस्कुराने की
क्या बात हो गई! एक ही ईश्वरीय रचना होते हुए भी, इतनी भ्रांतियां क्यों पाई जाती हैं किन्नरों के बारे में!


बिल्कुल सही अंदाजा लगाया आपने। नर्वस सा हो गया। मै ही क्यों, मेरा एक और सहयात्री भी। उनकी
बातों से पता लगा, उनमें से एक शायद गम्भीर रूप से बीमार हो। चार किन्नरों में से एक का बर्थ पास
वाली कोच में था। स्वाभाविक ही था कि वे एडजस्टमेंट की अपेक्षा में थे, एक साथ हो जाने की। कोई भी
इंसानी समूह ऐसा ही करना चाहेगा। धीरे-धीरे बातें भी होने लगीं। यहां भी पहल की उन्हीं के दल के नेता
ने, जिसे वे माँ कहते थे। माँ नामक लड़कों की तरह बालों वाले इस युवा किन्नर में गजब की नेतृत्व क्षमता
दीख रही थी।


शुरुआत में ही कई बार श्रीमती जी ने सुरक्षा निर्देश जारी कर दिये इशारों-इशारों में ही। समय के साथ स्थितियाँ
स्पष्ट होनी शुरू हुईं। उनके पास कोई निचली बर्थ नहीं थी, जबकि एक बीमार साथी के कारण उन्हें इसकी
आवश्यकता तो थी ही। हमारे दूसरे सहयात्री ने सहृदयता दिखाई और यह प्रस्ताव दे डाला कि हम तीनों सामान्य
जन एक तरफ हो जाएं। परंतु संवाद हीनता के कारण एक गड़बड़ हो गई और जबा नामक किन्नर अपने ऊपरी
बर्थ पर जाकर सो गई और फिर अगले दिन नाश्ते के समय ही उतरी। इस प्रकार सीट समझौते के पहले फार्मूले
की भ्रूणहत्या हो चुकी थी। अब दूसरा फार्मूला यह बचता था कि इस तरफ वाली बीच की और नीचे वाली बर्थ भी
उन्हें दे दी जाए और दूसरी तरफ वाली अर्थात चार, पाँच और छः  हम ले लें। ऐसा लगा ही था कि सहमति बन गई
है तभी एक और लोचा आ गया। बीमार किन्नर किसी प्रकार दूसरे की सहायता से थोड़ी चहलकदमी करने गई तो
श्रीमती जी उछलकर मेरे पास आ गईं, पता नहीं, खतरे से बचने के लिए या बचाने के लिए! चाहे जो भी वजह रही
हो, सीट एडजस्टमेंट का दूसरा फार्मूला भी इसके साथ ही ध्वस्त हो गया। अब विकल्प यह बचता था कि या तो हम
सभी अपनी-अपनी निर्धारित शायिकायें पकड़ें जिसकी सम्भावना कम नजर आ रही थी उनकी शारीरिक भाषा तथा
डीलडौल के कारण, या फिर, एक, दो और छः हमारे पास रहे। श्रीमती जी ने भी अपनी भाव भंगिमा से स्पष्ट कर
दिया कि वे ऊपर नहीं जा सकतीं। अब तक के दो प्रस्तावों को बिखरते देखकर निर्णय को अंतिम पल तक टालने में
ही भलाई समझी। कहते भी हैं, वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है।


टिकट निरीक्षक आया और पहचान पत्रों की जाँच कर चला गया। सात नंबर की सीट की उनकी मंशा पर टीटी ने
पानी फेर दिया यह कहकर कि ‘उसकी है’। टीटी के जाते-जाते माँ ने यह स्पष्ट कर दिया कि पास वाली कोच की
चौथी सवारी जो कि गुरू सम्बोधित हो रही थी के पास पहचान पत्र नहीं था। उनकी आरम्भिक बेचैनी का कारण
भी शायद यही था।


आगे की मेरी यात्रा उनके बातों को सुनने और समझने से ही बाबस्ता रही और यही पहलू मेरी इस यात्रा की खासियत
भी है। माँ अपने बीमार साथी को शल्यचिकित्सा हेतु कलकत्ता से लेकर दिल्ली आई थी। वापिसी में गुरू और जबा भी
साथ हो लिये। इस प्रकार वे चार एक परिवार की मानिंद तत्काल में टिकट लेकर कोलकाता की यात्रा पर थे।


बातों-बातों में यह भी पता चला कि कुछ दिनों पहले ही अपने एक और साथी/शिष्य को लेकर माँ ऑपरेशन के लिए
दिल्ली आ चुकी थी। इसलिये वह तो रेल के नियम कायदों से वाकिफ थी पर उसके अन्य साथी लंबी यात्रा में घबराते थे।


हमारे सहयात्री ने छः नम्बर की ऊपर की शायिका लेना स्वीकार किया, जिसे माँ ने गुरू को समझाया और तकलीफ में
पीड़ित उसके साथी के प्रति सम्वेदना के प्रति अनकहा आभार प्रदर्शित किया। वे मुख्यतया बंगला में वार्तालाप कर रहे
थे। बीच-बीच में उनका खिलंदड़ापन भी जाहिर हो रहा था, जैसे कि किसी भी खाली पड़ी शायिका पर जाकर पसर जाना
या हाथों को झटक-झटककर जोर-जोर से बातें करना या गाना गाने लग जाना बिना किसी की रत्तीभर भी परवाह किये
हुए।


जबा ने रात को खाना नहीं खाया था। सुबह में जबतक उसने नाश्ता नहीं कर लिया तबतक माँ की चिंता और बेचैनी
भावना से भीगी प्रतीत हो रही थी। गुरू का माँ के और जबा द्वारा बीमार के पैर दबाना मानवीय सम्वेदना के उत्कृष्ट
प्रदर्शन थे।


रास्ते से फोनकर माँ ने अपने किसीे अन्य साथी को तीन किलो लोटे माछ और डेढ़ किलो पारसा माछ खरीदकर रखने
का आग्रह किया। जाहिर है अगले दिन की पार्टी की तैयारी हो रही थी। फोन पर किसी से बातें करते हुए माता-पिता की
महिमा का बखान दिल को छू गया। उसी माता-पिता की जो जन्म देने के बाद उन्हें एक स्वाभाविक जीवन देने में
असमर्थ थे। कोई गिला-शिकवा नहीं, जो है, बस उसका कृतज्ञता ज्ञापन! हर भोजन के बाद बिना किसी अपवाद के ईश्वर
का धन्यवाद प्रदर्शन हमारे लिए भी नसीहत थी।

अब अनंत का तत्व प्रश्न तो यह है कि ये किन्नर आते कहाँ से हैं? अगर इसी समाज की उपज ये भी हैं, जैसे कि हम
सभी तो फिर इतने फासले और भ्रांतियाँ क्यों प्रचलित हैं? कानून ने तो इन्हें एक तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दे दी
मगर क्या हम तैयार हैं?

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