कलंक का एक टीका है
समाज के चेहरे पर बदनुमा धब्बा है
कोढ़ है, खराश है, एक गलाजत है
जिसका नाम दहेज है।
पाखण्ड का प्रतीक है
झूठ है, प्रपंच है
छुद्र है, दरिद्र है
अतयंत ही कारुणिक है
आये तो मजा है
माँग ले तो सजा है
आग का दरिया है
वही समझे जिसने झेला है
जाल फरेब का है
देखो ये प्रपंच कैसा है
खुद फंसतीचिड़ियाँ है
व्यर्थ बदनाम बहेलिया है
हर शख्स परेशान है
ढो रहा निशान है
बातें तो इंसानियत की हैं
मगर लहूलुहान भी वही है
धन का बेहिसाब प्रदर्शन है
देश का नकली दर्शन है
काल का क्रूर नर्तन है
बंद करो झूठ का संकीर्तन है
कभी कुँआरी रह जाती है
कभी बली चढ़ा दी जाती है
मानवता सिसकती है
दहेज की चक्की में बेटी पिस जाती हैं