लघुकथा - नुश्खे पर आहार

हर बुधवार को गाँव के प्राथमिक चिकित्सालय में प्रखंड स्तर से एक चिकित्सक की ड्यूटी लगती है । आज डा॰ विजय राम की बारी है । बहुत सारे मरीजों में से एक सुगिया भी है जो अपने तीन साल के बच्चे को गोद में लेकर आई है । उसका बच्चा चल भी नहीं पा रहा । माथा बड़ा सा, पेट फूला हुआ और हाथ पैर सूखी टहनियों की तरह। पतली सी गर्दन बड़ी मुश्किल से सिर का बोझ सम्हालने की कोशिस करते से प्रतीत हो रहे थे। आँखें मानों खोढ़रों से बाहर आने को बेताब हो रहे हों।
डॉक्टर ने मुआयना किया। बीमारी तो पहली नजर में ही समझ में आ गयी थी। फिर भी तसल्ली के लिए पलकों को उठाकर पुतलियों का पीलापन देखा, पेट को ठोंक कर देखा, स्टेथोस्कोप लगा कर धड़कनें सुनी और हाथों को कोहनी से तथा पैरों को घुटनों से मोड़ कर देखा। बच्चे को जीभ दिखाने को कहा। सुगिया पूरे मनोयोग से बच्चे के गाल दबा-दबा कर जीभ निकलवा कर दिखाने लगी।
डॉक्टर अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया और सर झुकाकर सरकारी अस्पताल की छोटी सी पर्ची (एक चौथाई पन्ने वाली) पर पूरे जतन से लिखने लगा। लिख चुकने के बाद पर्ची को सुगिया के हाथों में देते हुए बोला ........
“कुछ विटामिन की दवाइयाँ हैं जो यहीं मुफ्त में मिल जाएंगी। बच्चे के खान-पान पर ध्यान देने की जरूरत है। दूध और फल खाने में देना होगा। “
सुगिया को काटो तो खून नहीं! सोचकर आई थी कि ‘दवाई और डॉक्टर के हाथ का यश. ......... बच्चा ठीक हो जाएगा। कितनी मुश्किल से मेहनत मजूरी कर माड़-भात, नमक रोटी का इंतजाम कर पा रही थी! दूध और फल ....... हुंह ......... . . ।’

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