हे देवी !
कितने तेरे रूप
माँ, बहन और भार्या
दादी, नानी, मामी, बुआ, मौसी........
देवी कह दासी बना दी गई
आभूषणों की बेड़ियों में जकड़ी गई
कभी उफ तक न किया।
गृहस्थी की ज़िम्मेदारी ऐसी
बह गया समय कब पता न चला!
सृजन का सुख अनंत
भूल गई सारे दुख
संतति के सुख मे।
कर दिया न्योछावर
अर्पित कर दिया सर्वस्व
समर्पण का भाव अविरल!
खुद को खोकर भी
सबकुछ पा लेने का संतोष
नमन तुम्हें हे देवी
तुम नारी हो ।