कूड़े बीनने वाला लड़का

हर रोज, सुबह, तड़के उठकर 
निकल जाता है वह 
और कालिख पोत आता है 
सूरज के मुख पर 
जो तमतमा कर हो जाता है लाल 
और खिलखिला उठता है वह। 
हँस देने से उसके 
शर्मा कर भाग जाता है अंधेरा
तब कहीं जाकर होता है सवेरा। 
सवेरा, जो भूख लेकर आता है 
अभावों के दिन लेकर आता है 
छोटे-छोटे कंधों पर 
बड़े-बड़े बोझ डाल जाता है 
जो घर से निकलता है 
जिम्मेदारियों का बोझ लेकर 
और लौटता है 
व्यवस्था की लाचारियों से दबकर 
सिसकता बचपन आज बीनता है 
उम्मीदों के कचरे 
जलाए रखने की खातिर 
टिमटिमाते सपनों की लौ।

लगता है कोरोना अब जाने लगा है

  लगता है कोरोना अब जाने लगा है बेचैनी सी हर तरफ छाने लगी है  बंदिशें अब यंत्रणा लगने लगी है  बादल निराशा के गहराने लगे हैं  सड़कों पर वाहन फ...