लघुकथा - बेटी बचाओ बेटी पढाओ

अस्पताल के गलियारों में इन दिनों बस एक ही फुसफुसाहट चल रही थी। स्टाफ, नर्स या सफाई कर्मचारी जो भी कोई
किसी से मिलता, बस यही  पूछ बैठता! … “क्या हुआ, आज भी 414 नम्बर का कोई नहीं आया?”
      “अरे … मिलने भला कौन आयेगा! जब मरने को छोड़ गये हों! कोई बता रहा था डिप्टी सुपरिटेंडेंट को बता कर
गया है कलयुग का श्रवण कुमार कि खत्म होने पर फोन कर देना, बिल सेटल कर बाडी ले जाऊंगा।”
       “सुनते हैं बेटा और बहू दोनों ही बहुत बड़े ओहदों पर हैं, बराबर काम के सिलसिले में विदेश जाना लगा रहता है।”
        “अरे काहे का बड़ा, थू है ऐसे बड़प्पन पर जो आखिरी वक्त पर माँ-बाप को इस हालत में छोड़ जाते हैं!
… भगवान भला करे सिस्टर निवेदिता का, इस तरह सेवा कर रही है बेचारी, जैसे सगी माँ हो।”
      “सुनते हैं अब तो खाना भी वह घर से ही लाने लगी है, उसके लिए।”
      “हाँ, क्यों नहीं करेगी वह, … खुद भी कचरे के डब्बे में पड़ी मिली थी, इसी अस्पताल की सफाई वाली थी मीरा,
उसीने इसको पाला था। इसे तो हर औरत में अपनी माँ ही नजर आती है… पगली कहीं की … ।”
      “क्या जिंदगी बनाई है औरत की, बच्ची हो या बुढ़िया, कभी कचरे के ढेर तो कभी अस्पताल के बेड पर फेंक दी
जाती है!”

      “मत भूलो कि दोनों ही अवस्थाओं में सम्भालने वाली भी कोई औरत ही होती है। … चलो सब अपने काम पर
जाओ सुपरवाइजर आता ही होगा …।”

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