हे भगवान !
यूँ हड़बड़ी तो हर रोज हो ही जाती है, पर 'आज कुछ ज्यादा ही देर हो रही है।' ड्राइंग हाल की घड़ी में तो साढ़े नौ बज भी चुके। 'माना कि15 मिनट आगे चलती है, तो क्या हुआ, अभी कई सारे छोटे-मोटे काम भी तो निपटाने हैं।' जैसे-तैसे बदन को अंगोछे से पोंछते हुए, बेडरूम के कोने में बने मंदिर के सामने अचानक ही खुद को पाता है। एकबार को तो ख्याल आया, 'आज पूजा गोल ही कर दिया जाए),' जैसे कि नहाने से पहले स्नान के बारे में सोचा था। दोनों ही बार पत्नी का ख्याल करके हिम्मत नहीं जुटा सका। नहाने में ताने का डर, पूरे खानदान के लांछित हो जाने का खतरा था तो पूजा नहीं करने पर भावना के अनादर का जोखिम था। कितने यत्न से जबतक वह नहाकर निकलें, पूजा के बर्तन धो-चमकाकर रख जाती है।आसन बिछाकर बैठने को ही होता है कि एक टीवी वाले बाबा का प्रवचन याद आ गया। "सबसे पहले मंदिर के मस्तूल का दर्शन करना चाहिए।" अब, बहस करने का क्या फायदा, पलकें उठाई और हो गया दर्शन। लेकिन चूंकि देर हो रही है इसलिए सारे मंत्र सिर्फ 'एक-एक बार ही पढूंगा।' ओह! अगरबत्ती भी तो जलाना है। 'चलो, अगरबत्ती जलाते हुए ही गायत्री मंत्र का पाठ कर लेता हूं। नहीं, नहीं, सबसे पहले गुरु मंत्र।' 'ॐ....' एक नजर, घड़ी पर। 'अब, गायत्री मंत्र, ॐ भूर्भुवः ....' सामान्यतया तो 11 बार करता था, पर आज, 'बस एक बार ही'। 'समय ही कहाँ है!' अगरबत्ती जल तो गयी मगर लौ नहीं बुझी है, 'चलो दिखाना शुरू करता हूँ, तबतक खुद ही सही हो जाएगी।' एक बार फिर से घड़ी पर नजर जाती है। 'काम चल जाएगा।' महामृत्युंजय मंत्र, 'ॐ त्र्यम्बकं .....।' एक शिवजी कैलेंडर में भी टंगे हैं, 'उधर भी अगरबत्ती का धुआं जाना चाहिए।' श्रद्धा से आंखें बंद हो गईं। रसोईघर से कुछ खटपट की आवाजें आ रही हैं। 'कौन समझाए, ये काम बिना शोरगुल के भी तो हो सकता था, पांच मिनट के लिए भी ध्यान करना मुश्किल।' अपने प्राथमिक विद्यालय के दिनों की एक प्रार्थना जो कि दिनचर्या का हिस्सा बन गयी, 'त्वमेव माता च ....।' अब अपने गांव के नाटक की सरस्वती वदंना, 'या कुन्देन्दु तुषार धवला .....' पिताजी की याद आ गयी, कितने जोर शोर से पाठ करते थे, 'कर्पूर गौरं करुणावतारं .....।' श्री गुरुचरण .... 'नहीं नहीं, हनुमान चालीसा आज नहीं, अब समय बिल्कुल भी नहीं।' बजरंगबली का ध्यान ‘.... मूड ठीक रहा तो शाम में कर लेंगे प्रभू, साथ में हनुमामाष्टक भी कर लेंगे।' अब तो बस, टुनटुनी .... 'सभी देवताओं के नाम'। यही संकेत भी हो गया, नाश्ते का। पड़ोस से लयबद्ध टुनटुन की आवाज कितनी ही देर तक आती रहती है और भली लगती भी है। 'मुझे तो खैर जल्दी है।' पैरों में झुनझुनी सी हो आई। संभल कर उठना पड़ा।कपड़े पहनते हुए 'ॐ श्री गंग सौम्याय .....' धर्मयुग पत्रिका से याद किया था 'समृद्धि हेतु'।
कपड़े पहनते-पहनते आधी हनुमान चालीसा तो हो ही गयी। 'हो सका तो बाकी भी रास्ते में ही निबटा लूंगा। शाम का लफड़ा ही क्यों पालना। अगर कर ही पाया तो शाम को सिर्फ ध्यान करूँगा, रक्तचाप में फायदा रहता है।'
स्कूटर को हाथ लगाया ही था कि मोबाइल की घंटी बजने लगी। जल्दी से उठाया, बिना नाम जांचे ही स्वाइप किया और अपने ही अंदाज़ में 'हेलो' कहा। ".... अरे नहीं, कोई बात नहीं, बोलिये ना .... कोई जल्दी नहीं जी, कहिये ना, .... अच्छा-अच्छा ...."! हे भगवान !
19/10/2017