कहानी बर्बादी की
आता है तेज बहाव के संग,
और हो जाती है पीर पर्वत समान,
जीवनदायिनी ही हरने लगती है जीवन।
पूरे वेग से बह रही जलराशि,
साथ लेकर अपने वह सब कुछ,
जो भी आ जाए उसकी राह।
जीव-जंतु या वनस्पतियां,
मलबे में बदल जाता है,
बसा बसाया घर संसार।
कीचड़ बन, बह जाती हैं,
जोड़ी गई परिसंपत्तियां।
फेनिल, वेगवान जलप्लावन,
फन काढ़े मानों सहस्त्रों भुजंग,
फुंफकारते, करते विषवमन,
प्रचंड हाहाकारी, दिल दहलाने वाली!
और, पीड़ितों के क्रंदन …!
जीवन की अभिलाषा और
सब कुछ सहेज लेने की आपाधापी,
कितनी ही कहानियां तिर आती हैं,
जल-प्लावन से पहले,
मगर छोड़ जाती है,
कहानी बस एक, ‘बर्बादी’ की।
पता नहीं, कौन किसके काम आ जाये,
या कौन किसके साथ भाग जाये!
हर बरस बाढ़ बहा ले जाती है,
धन-दौलत, घर-द्वार से भी पहले,
रिश्ते, मर्यादा और धरम।
०४/०९/२०१७