अभिशप्त
कितना मुश्किल है जीना,
जब हो पता, होगा भोगना हर बार ही,
उसी विभीषिका को,
जिसे कहते हैं, बाढ़!
हां, बाढ़ !
बाढ़ ही तो कहते हैं,
जब फैला होता है, चारों ओर पानी,
गंदला सा पानी ।
पानी तो होता है,
मगर किसी काम का नहीं ।
पी तो समुद्र का पानी भी नहीं सकते,
मगर उसकी एक मर्यादा होती है ।
मर्यादाहीन, उच्छृंखल होना ही
जलराशि को बाढ़ बना देता है ।
ओह, कितना मुश्किल है जीना
जब पता हो, घर नहीं है बनाना,
क्योंकि हर वर्ष है उजड़ जाना।
बाढ़ का आना तो तय ही होता है,
संशय तो सिर्फ इस बात को लेकर होता है
कि विभीषिका कितनी होगी,
प्रलय मचेगी कितनी,
कितनों को अपने साथ ले जायेगी!
जो चले गए, मानों पिंड छूटा!
जो रह गये, हों अभिशप्त जैसे,
प्रतीक्षा में, एक और विभीषिका की!
बर्बादी की, अगली बाढ़ की!
जब हो पता, होगा भोगना हर बार ही,
उसी विभीषिका को,
जिसे कहते हैं, बाढ़!
हां, बाढ़ !
बाढ़ ही तो कहते हैं,
जब फैला होता है, चारों ओर पानी,
गंदला सा पानी ।
पानी तो होता है,
मगर किसी काम का नहीं ।
पी तो समुद्र का पानी भी नहीं सकते,
मगर उसकी एक मर्यादा होती है ।
मर्यादाहीन, उच्छृंखल होना ही
जलराशि को बाढ़ बना देता है ।
ओह, कितना मुश्किल है जीना
जब पता हो, घर नहीं है बनाना,
क्योंकि हर वर्ष है उजड़ जाना।
बाढ़ का आना तो तय ही होता है,
संशय तो सिर्फ इस बात को लेकर होता है
कि विभीषिका कितनी होगी,
प्रलय मचेगी कितनी,
कितनों को अपने साथ ले जायेगी!
जो चले गए, मानों पिंड छूटा!
जो रह गये, हों अभिशप्त जैसे,
प्रतीक्षा में, एक और विभीषिका की!
बर्बादी की, अगली बाढ़ की!