अरमानों के पुतले

अरमानों के पुतले
सजे-धजे बाजारों में,
बिकते अरमानों के पुतले।
है चकाचौंध हर तरफ,
दुविधा है भारी, यह ले या वह ले।
बन गयी है बाजार दुनियाँ,
ले खुलकर या मन मसोसकर।
जरूरत की अब बात कहां,
सामर्थ्य रह गयी उलाहना बनकर।
डोलता हूँ मैं अकिंचन,
बेसुध किन ख्यालों में!
थाम न ले कोई मुझको,
न हो जाऊं गुम कतारों में।
रह गयी है बोझ बनकर,
जीवन की नैया डोल रही।
हट दूर, चल परे, ऐ किनारो,
मेरी तो मौज दरिया में मन रही।

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