आशा की किरण
तीज-त्यौहार में ही सही,
छुद्दियों में या इतवार ही सही,
सबको मालूम है नहीं रुकोगे, पर
यही क्या कम है कि आ जाते हो तुम।
निराशा के बादल भले ही छाते हैं
लहर किनारे से टकराकर विलीन हो जाती है
लहरों का किनारों से मिलन रहता है अधूरा ही
मगर यही क्या कम है कि तरंगें उठती तो हैं।
मन के मनके जब गुंथे जाते हैं
एक सूत्र में जब पिरोये जाते हैं
बनते हैं, टूटकर फिर से बिखर जाते हैं
छणिक ही सही, मगर माला बनती तो है।
अरमान अधूरे रह जाते हैं
सपने कब किसके पूरे होते हैं
भले ही न हो कभी मिलन हमारा
खुश हूँ इसमें भी कि याद आती तो है।
आते जाते पल भर को दिख जाती है,
न जाने किन ख्यालों में मुस्काती है!
करम मुझ पे नहीं, कोई बात नहीं,
यही क्या कम है कि मुस्कुराती तो है.
निराशा के बादल घनेरे उठते हैं,
उमड़-घुमड़ कर गुजर जाते हैं।
रहती है उम्मीद जिन्दा किसानों की
इतने से भी कि बादल गरजते तो हैं।
टिमटिमाता हुआ ही सही,
तेज ना, मद्धम ही सही,
अँधेरा कितना कम हुआ, ग़म नहीं!
इतना ही बहुत है कि दिया जलता तो है।