दु:खों का आलम ऐसा है कि जीना दुश्वार है
भीड़ बहुत है मगर भूखों-नंगों की भरमार है।
चलते-चलते मिल जाते हैं चेहरे जाने पहचाने से
झूठी कसमें खा कर ही चलता इनका व्यापार है।
कभी मजहब तो कभी जाति पर बंट जाते हैं
लोक तंत्र का दोस्तों इस मुल्क में बंटाधार है।
शिकायत बहुत है, कोई नहीं सुनता इनकी
बाहर, निकल कर तो देखो, बौराई बहार है।
देवी है, दुर्गा है, महानता की सब थोथी बातें हैं
नारी उत्पीडन की घटनाओं से भरा अख़बार है।
दुनियां मौत के दहाने पर आकर बैठ गई है
परमाणु बम का किसका कितना अम्बार हैं।
हर रोज धमकियों की बारिश सी होने लगी है
"उन"के गले में मिसाइलों और बमों का हार है।
02-01-2018