उम्मीद

भयानक सर्दी पड़ी है
अंगीठी सो चुकी न जाने कब की
कुरेद रहे हैं राख
शायद उम्मीद बची है ।
जगह-जगह बनी छिद्रें
कम्बल उघड़ जाने से
फूटी किस्मत की तरह ।
आलू जो डाल दिए थे घूरे में
पकी, अधपकी या अनपकी
मगर दे गयी सांसें
एक और सुबह की ।
बेदम करती खांसी
टूटते ख्वाबों की तरह अटकता
बलगम का ज्वार ।
सारा वजन चढ़ आया माथे पर
मुसीबत की तरह
टिक आई ठुड्ढी घुटनों पर
कुछ तो सहारा है!
03/01/2018

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