लेह - यात्रा वृतांत
साढ़े नौ बजते-बजते हमारा विमान लेह के छोटे से एयरपोर्ट पर उतर चुका था। अक्टूबर महीने में भी
दिल्ली में तो लोग-बाग मारे उमस और गर्मी के परेशान ही रहते हैं। बिना पंखे और शीत-ताप
नियंत्रक के गुजारा मुश्किल होता है, जिन्हें इनकी आदत लगी हुई हो। तापमान में अचानक से हुआ
परिवर्तन थोड़ी देर को तो बहुत ही सुखद प्रतीत हुआ। ओह ! वह चमकती हुई धूप और शीतल हवा !
मन-मयूर आनंद के अतिरेक से झूम उठा।
दिल्ली में तो लोग-बाग मारे उमस और गर्मी के परेशान ही रहते हैं। बिना पंखे और शीत-ताप
नियंत्रक के गुजारा मुश्किल होता है, जिन्हें इनकी आदत लगी हुई हो। तापमान में अचानक से हुआ
परिवर्तन थोड़ी देर को तो बहुत ही सुखद प्रतीत हुआ। ओह ! वह चमकती हुई धूप और शीतल हवा !
मन-मयूर आनंद के अतिरेक से झूम उठा।
सामान लेकर परिसर से बाहर निकलते ही हमारा स्थानीय यात्रा प्रबंधक हमारे नाम की तख्ती हाथों
में लिए सामने ही दिख गया।
में लिए सामने ही दिख गया।
एक स्थान पर सभी को एकत्रित कर उसने जरूरी हिदायत जारी कर दिए कि पहले दिन शरीर को
वहां के वातावरण का अभ्यास होने देने के लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा आराम किया जाए।
कम से कम भागदौड़ की जाए, हो सके तो स्नान को भी नमस्कार कर दिया जाए। उस समय तो
नहीं, लेकिन बाद में उसके इन निर्देशों का महत्व हमने समझा। उस समय तो आदतन हमने शक
किया और उसकी इन हिदायतों को खर्च बचाने की तकनीक समझा। कहा भी गया है, ‘अच्छी बातें
आसानी से कहाँ समझ में आती हैं’!
वहां के वातावरण का अभ्यास होने देने के लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा आराम किया जाए।
कम से कम भागदौड़ की जाए, हो सके तो स्नान को भी नमस्कार कर दिया जाए। उस समय तो
नहीं, लेकिन बाद में उसके इन निर्देशों का महत्व हमने समझा। उस समय तो आदतन हमने शक
किया और उसकी इन हिदायतों को खर्च बचाने की तकनीक समझा। कहा भी गया है, ‘अच्छी बातें
आसानी से कहाँ समझ में आती हैं’!
होटल में चेक इन करते ही महिलाओं और लड़कियों को हमारे सामान लेकर दौड़कर सीढ़ियां चढ़ते
हुए, सामान को कमरों तक पहुंचाते देखकर झटका सा लगा। जिन सीढ़ियों पर बिना सामान चढ़ने
में भी हमारी सांसें उखड़ रही थीं, वे दौड़कर आ जा रही थीं। पता नहीं विधाता ने उन्हें इतनी सामर्थ्य
दी हुई है या परिस्थिति और मजबूरियों ने ऐसा बना दिया है !
हुए, सामान को कमरों तक पहुंचाते देखकर झटका सा लगा। जिन सीढ़ियों पर बिना सामान चढ़ने
में भी हमारी सांसें उखड़ रही थीं, वे दौड़कर आ जा रही थीं। पता नहीं विधाता ने उन्हें इतनी सामर्थ्य
दी हुई है या परिस्थिति और मजबूरियों ने ऐसा बना दिया है !
निर्देशों के विपरीत हम कमरों में आराम करने की बजाय परिसर में बने चबूतरे पर बिछी कुर्सियों पर
बैठ कर धूप का मजा लेने लगे और आस-पास की पारिस्थितिकी का जायजा भी। वहीं पर नाश्ता भी
मँगा लिया और इतना ठूंस लिया मानों दुबारा भोजन से मुलाकात होनी ही नहीं हो !
बैठ कर धूप का मजा लेने लगे और आस-पास की पारिस्थितिकी का जायजा भी। वहीं पर नाश्ता भी
मँगा लिया और इतना ठूंस लिया मानों दुबारा भोजन से मुलाकात होनी ही नहीं हो !
पास में ही लाल-लाल सेबों से लदा पेड़ देखकर कुछ लोगों ने जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया। बच्चों ने
शुरुआत की, बड़ों ने इशारा किया और फिर सारे ही बचपन की यादें ताजा करने में जुट गए। नतीजा
हुआ कि अगले ही दिन, बस पेड़ ही बचा था !
शुरुआत की, बड़ों ने इशारा किया और फिर सारे ही बचपन की यादें ताजा करने में जुट गए। नतीजा
हुआ कि अगले ही दिन, बस पेड़ ही बचा था !
होटल का बावर्ची बड़ा ही कुशल था। दोपहर का भोजन लाजवाब बनाया। हमने फिर यह सोचकर
खाया कि कम खाने से कहीं वह बुरा न मान जाये ! उस तर्क से भी बढ़कर, हमारी एक आदत रही है,
परदेस क्या भरोसा, क्या पता, कब कौन सी समस्या आ खड़ी हो, इसलिए जबतक मिल रहा हो,
यही सोचकर ग्रहण किया जाये कि अगली शाम का क्या भरोसा, ‘सिर्फ खाने के नाम पर’ ! इस
दूरंदेशी सोच का नतीजा यह रहा कि पूरी यात्रावधि में फिर कभी खाने में रूचि नहीं आई और पेट
हमेशा गुड़गुड़ करता रहा। उस शून्य से भी कम के तापमान में बार-बार अंदर-बाहर ! चिंता पेट से
शुरू होकर दिमाग तक गैस के रूप में भर गई !
खाया कि कम खाने से कहीं वह बुरा न मान जाये ! उस तर्क से भी बढ़कर, हमारी एक आदत रही है,
परदेस क्या भरोसा, क्या पता, कब कौन सी समस्या आ खड़ी हो, इसलिए जबतक मिल रहा हो,
यही सोचकर ग्रहण किया जाये कि अगली शाम का क्या भरोसा, ‘सिर्फ खाने के नाम पर’ ! इस
दूरंदेशी सोच का नतीजा यह रहा कि पूरी यात्रावधि में फिर कभी खाने में रूचि नहीं आई और पेट
हमेशा गुड़गुड़ करता रहा। उस शून्य से भी कम के तापमान में बार-बार अंदर-बाहर ! चिंता पेट से
शुरू होकर दिमाग तक गैस के रूप में भर गई !
सायंकाल में शांति स्तूप के दर्शन कर लौटे तो सीधे उस मंडप में, जहां विशेष रात्रि-भोज का इंतजाम
था। फिर तो ग्यारह बजे तक सिर्फ निर्देशों की धज्जियाँ ही उड़ती रहीं। अलाव (बोन फायर) के पास
मंजे हुए स्थानीय कलाकारों ने नृत्य नाटिका में उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ वहां की सभ्यता-संस्कृति
और परम्पराओं की जानकारी दी।
था। फिर तो ग्यारह बजे तक सिर्फ निर्देशों की धज्जियाँ ही उड़ती रहीं। अलाव (बोन फायर) के पास
मंजे हुए स्थानीय कलाकारों ने नृत्य नाटिका में उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ वहां की सभ्यता-संस्कृति
और परम्पराओं की जानकारी दी।
अगली सुबह स्थानीय मठों के दर्शन कराये गए। बौद्ध मठों की विशेषता होती है, यहां की भव्यता के
मध्य वास करती उत्कृष्ट आध्यात्मिक परम्परा। यहाँ कोई उगाही करता हुआ नहीं मिलेगा, ना ही
ऊल -जलूल प्रतिगामी प्रवचन। कभी भी इन मठों में एक बार दस मिनट के लिए शांति से बैठकर
देखिये, पारलौकिक आनंद की अनुभूति से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते।
मध्य वास करती उत्कृष्ट आध्यात्मिक परम्परा। यहाँ कोई उगाही करता हुआ नहीं मिलेगा, ना ही
ऊल -जलूल प्रतिगामी प्रवचन। कभी भी इन मठों में एक बार दस मिनट के लिए शांति से बैठकर
देखिये, पारलौकिक आनंद की अनुभूति से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते।
पूरा लेह क्षेत्र, जिसे कि ठंढा रेगिस्तान भी कहते हैं, बंजर पठारों से घिरा हुआ प्रतीत होता है मानों
विधाता ने किसी विशालकाय हल से इस प्रदेश को जोत दिया हो और फिर बाकी का कार्यक्रम किसी
सरकारी योजना की तरह सरकार बदल जाने के कारण ठंढे बस्ते में चली गई हो। ताज्जुब की बात है
कि फिर भी धूल उड़ती हुई नहीं दिखती, यहाँ के लोगों के स्वभाव की तरह जिन्हें विधाता से ऐसी
दुरूह परिस्थिति की कोई शिकायत नहीं ! वे मजे से अपनी सीमित जरूरतों को पूरा करते हुए हर
समय संतोष के भाव से परिपूर्ण होते हैं।
विधाता ने किसी विशालकाय हल से इस प्रदेश को जोत दिया हो और फिर बाकी का कार्यक्रम किसी
सरकारी योजना की तरह सरकार बदल जाने के कारण ठंढे बस्ते में चली गई हो। ताज्जुब की बात है
कि फिर भी धूल उड़ती हुई नहीं दिखती, यहाँ के लोगों के स्वभाव की तरह जिन्हें विधाता से ऐसी
दुरूह परिस्थिति की कोई शिकायत नहीं ! वे मजे से अपनी सीमित जरूरतों को पूरा करते हुए हर
समय संतोष के भाव से परिपूर्ण होते हैं।
तीसरी सुबह, कुछ लोगों, खासकर मोटे लोगों को साँस की शिकायतें पाई गईं। इसलिए प्रत्येक वाहन
में ऑक्सीजन के सिलिंडर रख लिए गए। नाश्ते के साथ ही हमारा काफिला पैंगोंग झील के लिए
रवाना हो गया। करीब १६० किलोमीटर का एक तरफ का फासला कच्ची और ऊबड़-खाबड़ सड़कों
पर। रास्ते सुनसान और चीरती हुई ठंढ में आबादी का कहीं नामोनिशान नहीं। यदाकदा पानी के
श्रोत दिखे तो आसपास ही घास चरते जानवर भी आँखों को सुकून पहुंचते से लगे। थोड़ी-थोड़ी दूरी
पर सेना के कैंप मिल जाते थे जो गर्म पानी, काली चाय, और सूखे मेवों से सैलानियों का स्वागत
करते थे। किसी को अगर चिकित्सीय आवश्यकता पड़ जाये तो वह भी निःशुल्क उपलब्ध कराते।
ऐसा लगता है मानों उनकी तैनाती पर सरकार इतना खर्च बस सैलानियों की सुविधा तथा मात्र यह
जताने के लिए ही करती है कि यह हिस्सा भी भारत का अंग है।
में ऑक्सीजन के सिलिंडर रख लिए गए। नाश्ते के साथ ही हमारा काफिला पैंगोंग झील के लिए
रवाना हो गया। करीब १६० किलोमीटर का एक तरफ का फासला कच्ची और ऊबड़-खाबड़ सड़कों
पर। रास्ते सुनसान और चीरती हुई ठंढ में आबादी का कहीं नामोनिशान नहीं। यदाकदा पानी के
श्रोत दिखे तो आसपास ही घास चरते जानवर भी आँखों को सुकून पहुंचते से लगे। थोड़ी-थोड़ी दूरी
पर सेना के कैंप मिल जाते थे जो गर्म पानी, काली चाय, और सूखे मेवों से सैलानियों का स्वागत
करते थे। किसी को अगर चिकित्सीय आवश्यकता पड़ जाये तो वह भी निःशुल्क उपलब्ध कराते।
ऐसा लगता है मानों उनकी तैनाती पर सरकार इतना खर्च बस सैलानियों की सुविधा तथा मात्र यह
जताने के लिए ही करती है कि यह हिस्सा भी भारत का अंग है।
रास्ते में ही वह स्थान भी पड़ता है, जिसे दुनियाँ में सर्वाधिक ऊंचाई पर बनी वाहन चालन योग्य
सड़क भी कहते हैं। पैंगोंग झील भी अपने आप में अजूबा ही है। इतनी ऊँचाई पर अवस्थित खारे
पानी वाला तथा ठंढ में जम जाने वाली झील जिसका दो तिहाई हिस्सा चीन के पास है। आजकल
यह स्थल आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘थ्री ईडीएट्स’ के लिए भी चर्चा में है। करीना कपूर वाली
प्रिया स्कूटर भी यहाँ पर प्रदर्शित की जा रही है, जिसपर सैलानी सेल्फी लेते हुए खुद को धन्य
मानते हैं।
सड़क भी कहते हैं। पैंगोंग झील भी अपने आप में अजूबा ही है। इतनी ऊँचाई पर अवस्थित खारे
पानी वाला तथा ठंढ में जम जाने वाली झील जिसका दो तिहाई हिस्सा चीन के पास है। आजकल
यह स्थल आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘थ्री ईडीएट्स’ के लिए भी चर्चा में है। करीना कपूर वाली
प्रिया स्कूटर भी यहाँ पर प्रदर्शित की जा रही है, जिसपर सैलानी सेल्फी लेते हुए खुद को धन्य
मानते हैं।
जांस्कार नदी के साथ सिंधु नदी के सम्मिलन एक संगम यहाँ भी है। पूर्णतया पारदर्शी पानी के साथ
नदियों का यह तिमुहाना क्या किसी कथा के स्वर्ग का हिस्सा नहीं है ! यहीं पर एक बिंदु ऐसा भी है
जहां गाड़ियाँ ढलान पर नीचे की बजाए बिना प्रयास के ही ऊपर की ओर लुढ़कने लगती हैं। चुम्बकीय
नियमों के विपरीत का आकर्षण देखकर यहां से सिर्फ सवाल ही लेकर लौट सकते हैं।
नदियों का यह तिमुहाना क्या किसी कथा के स्वर्ग का हिस्सा नहीं है ! यहीं पर एक बिंदु ऐसा भी है
जहां गाड़ियाँ ढलान पर नीचे की बजाए बिना प्रयास के ही ऊपर की ओर लुढ़कने लगती हैं। चुम्बकीय
नियमों के विपरीत का आकर्षण देखकर यहां से सिर्फ सवाल ही लेकर लौट सकते हैं।
लेह भ्रमण अर्थात अपने देश की विविधता का दर्शन। लेह परिभ्रमण का मतलब इंसान की दुर्दम्य
इच्छाशक्ति का प्रदर्शन। ...... मतलब आत्मिक शक्ति का पारावार ! ...... कभी न हारने का जज्बा !
..... मतलब बुद्धं शरणम् ......... !!
इच्छाशक्ति का प्रदर्शन। ...... मतलब आत्मिक शक्ति का पारावार ! ...... कभी न हारने का जज्बा !
..... मतलब बुद्धं शरणम् ......... !!