पलायन - दोहे

दिनांक : 16 मई 2020 / शनिवार
⭐ दोहे ⭐

जग बीती में है निहित, निज दुख का भी मूल।
समझ मनुज इस सत्य को, वरना होगी  भूल।।

बैठ रहे हम  आस  में,  धरे  हाथ  पर हाथ।
कहो भला कैसे मिले, लिखा विधाता माथ।।

श्वान गली में भौंकता,  ढूँढ  रहा  आहार।
मगर उसे मिलता नहीं, हड्डी का उपहार।।

लौट चले जो लोग हैं,  साथ  लिए परिवार।
सफर कोस का है नहीं, जाना मील हजार।।

एक साइकिल के  लिए,  बेचे  बुधुआ चेन।
हर पैडल पर सोचता, किसकी है यह देन।।

हाथ झटक मालिक गया,  देने  को न पगार।
लौट चले फिर गाँव को, श्रमिक कई लाचार।।

पैरों  में  छाले   पड़े,  मगर  नहीं  परवाह।
कोरोना के बस नहीं, ले हिम्मत की थाह।।

पैदल उसको  देखकर,  रखना  बरबस  याद।
डाल रहा था कल वही, भविष्य की बुनियाद।।


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