ग़ज़ल : राज़ अपना सुना रहा हूँ मैं
राज अपना सुना रहा हूँ मैं।
मौज में गुनगुना रहा हूँ मैं।।
रूठकर जो चले गये मुझसे-
फिर से उनको बुला रहा हूँ मैं।
मुतमईन लग रहा अभी तक जो-
ग़म जहाँ के भुला रहा हूँ मैं।
एक है वह कोई सितारा सा-
जाग उसको सुला रहा हूँ मैं।
ले गये हैं उसे चुरा जबसे-
रोज गंगा नहा रहा हूँ मैं।
झोपड़ी रास आ गई मुझको-
इक महल सा सजा रहा हूँ मैं।
आज सबसे 'सुनील' कह आया-
नाज उनके उठा रहा हूँ मैं।
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