अहिर्निश यात्रा
कहीं शाम, तो कहीं सुबह होती है।
सृष्टि पर दिवस का अवसान नहीं होता।
सतत कर्म ही जीवन है।
वीरों को विश्राम नहीं मिलता।
कर्त्तव्य पथ पर चलते हुए अनवरत,
आपने वह मुकाम हासिल कर लिया है।
एक सच्चे कर्मयोद्धा की तरह,
महाभारत का समर पार पा लिया है।
'वाह'! पिता, चाचा, भैया, बेटा,
समस्त परिजनों का असीम अनुराग निवेदन है।
एक विजेता को ही होता नसीब,
कृतज्ञता पूरित हार्दिक अभिनंदन है।
निष्कलुष और बेदाग जीवन बड़ी बात है,
गार्हस्थ्य को भी 'समभाव' से जी लेना कर्मयोग है।
मानसरोवर की गहराई, 'कैलाश' की ऊँचाई तक,
निर्विघ्न सम्पन्न हुआ यह कर्म यज्ञ।
सुंदर, सुमधुर, सुमंगल यह वेला है,
आशीष-तिलक लगाने को आतुर,
घर का आंगन है, प्रतीक्षारत माँ है,
जीवनभर को जीवन-संगिनी है ।
भरापूरा घरबार है,
पिछवाड़े की अमराई और बांसबिट्टी है।
पथ-पथिक, दिक्-दिगंतर की है चाह,
हमें भी मिल जाये आपकी सघन छाँव।
साँझ न कभी आने पाये,
सीमा न कोई तय हो, हे असीम।
विशाल से विशालतम की यह यात्रा,
चलती रहे निरंतर, अविरल, अविकल।